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Judiciary

1000 पति रख सकती हूं'... क्या ऐसी बात से कम हो सकती है हत्या की सजा? हाईकोर्ट ने दिया जवाब

By Kshipra Srivastava      29 June, 2026 05:17 PM      0 Comments
1000 पति रख सकती हूं क्या ऐसी बात से कम हो सकती है हत्या की सजा हाईकोर्ट ने दिया जवाब

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी की हत्या के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दोषी पति की सजा उम्रकैद से घटाकर 7 साल कर दी। अदालत ने कहा कि यह घटना पहले से बनाई गई योजना के तहत नहीं हुई थी। रिकॉर्ड से यह सामने आया कि पति-पत्नी के बीच अचानक झगड़ा हुआ और पत्नी की एक टिप्पणी से पति इतना गुस्से में आ गया कि वह अपना आपा खो बैठा। इसी वजह से अदालत ने इसे हत्या (Murder) नहीं, बल्कि ऐसी गैर-इरादतन हत्या माना जो अचानक हुए गुस्से और उकसावे में हुई थी। 

क्या था पूरा मामला?

मामले के अनुसार, पति शिवा और उसकी पत्नी के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। बहस के दौरान पत्नी ने कथित तौर पर कहा कि "मैं तुम्हारे जैसे हजार पति रख सकती हूं।" अभियोजन के अनुसार, इस बात के बाद झगड़ा बढ़ गया और पत्नी की मौत हो गई।

ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में पति को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उसने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपील की।

हाईकोर्ट ने क्या देखा?

हाईकोर्ट ने मामले के सभी सबूत, गवाहों के बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन किया। अदालत ने यह भी देखा कि घटना जिस जगह हुई वहां पत्थर थे और चोट कैसे लगी, इस पर भी विचार किया गया।

कोर्ट को ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आरोपी पहले से पत्नी की हत्या करने की योजना बनाकर आया था। अदालत का मानना था कि घटना अचानक हुए झगड़े के दौरान हुई और आरोपी ने गुस्से में अपना मानसिक संतुलन खो दिया था। 

'गंभीर और अचानक उकसावे' का क्या मतलब है?

आम भाषा में समझें तो कानून कहता है कि यदि किसी व्यक्ति को अचानक ऐसी बात या घटना का सामना करना पड़े जिससे वह अपना मानसिक संतुलन खो दे और उसी समय उससे कोई गंभीर अपराध हो जाए, तो हर मामले में उसे हत्या नहीं माना जाता।

लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि गुस्सा आने पर किसी की जान लेना सही है। अदालत हर मामले के तथ्य अलग-अलग देखती है। यह भी जरूरी होता है कि उकसावा वास्तव में गंभीर हो, अचानक हो और घटना उसी समय हुई हो। अगर व्यक्ति को सोचने या शांत होने का पर्याप्त समय मिल गया हो, तो इस नियम का लाभ नहीं मिलता। 

अदालत ने सजा क्यों कम की?

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी का अपनी पत्नी की मौत कराने का साफ इरादा साबित नहीं हुआ। हालांकि, उसे यह जरूर पता होना चाहिए था कि उसके कृत्य से किसी की जान जा सकती है।

इसी आधार पर अदालत ने माना कि यह मामला हत्या का नहीं बल्कि ऐसा अपराध है जिसमें आरोपी को अपने काम के नतीजे का अंदाजा था, लेकिन हत्या करने की पूर्व योजना या स्पष्ट इरादा साबित नहीं हुआ। इसलिए उसकी उम्रकैद की सजा घटाकर 7 साल का कठोर कारावास कर दिया गया। 

क्या हर अपमानजनक बात पर यह नियम लागू होगा?

नहीं। अदालतों ने कई फैसलों में साफ कहा है कि केवल गाली-गलौज या सामान्य बहस को "गंभीर और अचानक उकसावा" नहीं माना जा सकता। हर मामले में यह देखा जाता है कि क्या परिस्थितियां ऐसी थीं कि एक सामान्य व्यक्ति भी अपना आपा खो सकता था। इसलिए इस सिद्धांत का लाभ हर आरोपी को अपने-आप नहीं मिलता। 

इस फैसले का महत्व

यह फैसला बताता है कि अदालत केवल यह नहीं देखती कि किसी की मौत हुई है, बल्कि यह भी जांचती है कि घटना किन परिस्थितियों में हुई, आरोपी की मानसिक स्थिति क्या थी और क्या अपराध पहले से सोच-समझकर किया गया था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी की हत्या गंभीर अपराध है और आरोपी को सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन इस मामले के तथ्यों के आधार पर इसे हत्या की श्रेणी में रखना उचित नहीं था। इसलिए सजा कम की गई, आरोपी को बरी नहीं किया गया। 



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